शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

जीवन का संतुलन



जीवन


दुःख -सुख रुपी
दो धाराओं का
होता है संगम !

संतुलन
हो जाता है जब
किसी एक के पक्ष में
जिंदगी के उस दौर में
आ जाता है असंतुलन !

पूर्णतः
सुख की चाह
होती हैअर्थहीन और निस्सार !

क्योकि ,
तब न होगा
कोईजिंदगी का लक्ष्य !

किसी
उपादान का आभावही
होता है
जिंदगी का लक्ष्य !

इसलिए
सुख के आभाव के भाव को
जिन्दा न सही तो
जीवाश्म के रूप में ही सही
बनाये रखिये !

क्योकिस्वयं
सुखअपने अस्तित्व के लिए
याचक के रूप में
खड़ा है
दुःख के दरवाजे पर !!


                                          देवेन्द्र कुमारफतेहपुर,उप ।

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